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Jul 21, 2021

Raghunath Brahmchari Freedom Fighter Dularpur Teghra Begusarai रघुनाथ ब्रह्मचारी

प्रस्तुत आलेख में दुलारपुर तेघरा बेगूसराय के स्वतंत्रता सेनानी परम श्रद्धेय श्री रघुनाथ ब्रह्मचारी के जीवन चरित के विषय में जानकारी दी जा रही है।




व्यक्तित्व परिचय - श्री रघुनाथ ब्रह्मचारी

पारिवारिक जीवन:

रघुनाथ ब्रह्मचारी दुलारपुर क्षेत्र के बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे।  इनका जन्म दुलारपुर मठ से जुड़े कायस्थ परिवार में हुआ था। वर्तमान में दुलारपुर मठ के समीप नूनू डॉक्टर साहब के चचेरे बाबा थे। कालांतर में वो अपने परिवार के साथ बेगूसराय में बस गए और अभी वर्तमान में उनके दोनों पुत्रों के परिवार बेगूसराय में ही रहते हैं। उनके एक पुत्र सचिवालय में उच्च पदस्थ थे। 

शैक्षणिक:

रघुनाथ ब्रह्मचारी जी अपने जमाने के उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में से एक थे। यही नहीं उन्होंने तेघड़ा में उच्च विद्यालय की भी स्थापना की थी। परंतु उस विद्यालय को अंग्रेजों द्वारा बंद करवा दिया गया। उसके उपरांत उन्होंने लोगों को रोजगारपरक शिक्षा देने के लिए संस्थान की स्थापना की।

सामाजिक:

उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत तेघड़ा था काँग्रेस कमेटी के मंत्री के तौर पर की। वर्तमान में तेघड़ा में जो काँग्रेस ऑफिस दिखाई देता है। उसकी स्थापना में इनका काफी योगदान रहा था। इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और बेगूसराय के कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। 26 जनवरी 1931 को इनके नेतृत्व में प्रथम स्वराज दिवस के अवसर पर विशाल जुलूस निकालकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया गया। इस जुलूस पर बेगूसराय टेढ़ीनाथ मंदिर के समीप पुलिस द्वारा गोली चलाई गई जिसमें छः लोगों की मृत्यु हो गई और रघुनाथ ब्रह्मचारी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। वो भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भी काफी करीबी थे और उनके आह्वान पर राजेंद्र प्रसाद तेघड़ा भी आए थे। विदेशी सामानों के बहिष्कार में भी इन्होंने काफी अग्रणी भूमिका निभाई थी।

इनकी मृत्यु 2009 में बेगूसराय में हुई।

निवेदन: यदि आपके पास श्री रघुनाथ ब्रह्मचारी जी के विषय में कोई अन्य जानकारी या उनका कोई चित्र है तो हमें सूचित करें. हमारा पता है: words.pankaj@gmail.com

Jul 5, 2020

Shraddhanjali to Late Sri Ram Singh Dularpur Naya Tola Teghra Begusarai, Bihar

बाबू श्री राम सिंह स्वर्गीय हरिहर सिंह के एकलौते पुत्र थे। इनके बाबा बाबू तिलकधारी सिंह एक बहुत ही प्रसिद्ध व्यक्ति थे। दिनांक 9-6-2020 दिन मंगलवार को आप हम सब को छोडकर परम धाम की यात्रा पर निकल पड़े। उनकी अंत्येष्टि अगले दिन की गई । वे एक कर्मठ एवं धर्मपरायण व्यक्ति थे। हमारे इलाके में श्री त्रिवेणी गोष्ठी के संचालन एवं सहयोग में वे वर्षों तक सक्रिय रहे। आप एक सामाजिक एवं संगीत प्रेमी धर्मात्मा थे। आप किसी भी धार्मिक आयोजन एवं भजन -कीर्तन में अति सक्रिय रहते थे। आपके जाने से हमारे परिवार और समाज की अपूरणीय क्षति हुई है । अपने पीछे वे एक भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं । ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको परमधाम की प्राप्ति हो । 🙏🙏🙏




श्राद्धकर्म कार्यक्रम 


स्वर्गाश्रम गमन:- 09/06/2020 मंगलवार
दाह संस्कार कर्म:- 10/06/2020 बुधवार
क्षौर कर्म:- 18/06/2020 गुरुवार
एकादश कर्म:- 19/06/2020 शुक्रवार
द्वादश कर्म:- 20/06/2020 शनिवार
त्रयोदश कर्म:- 21/06/2020 रविवार

अपने पुत्र श्री राम कुमार सिंह और पौत्र भानु के साथ हैदराबाद में 

अपने पुत्र राजेश कुमार सिंह और पौत्र सुमित के साथ 




अपने प्रपोत्र वेदान्त के साथ


एक कर्मठ व्यक्ति 



श्री राम चा को मेरी शब्दांजलि एक कविता के रूप में


हे परमपूज्य हे कर्मवीर!
हे अभिभावक हे कला प्रवीण!
शत-शत नमन आपको करता हूँ।
घर -परिवार के उलझनों को
अब डांट-डपट कौन सुलझाएगा
जीवन के झंझावातों के बीच
हौसला अब कौन बढ़ाएगा
आपका जीवन पथप्रदर्शक
नित राह हमें दिखलायेगा।
आपके चरण कमलों में
श्रद्धा सुमन समर्पित करता हूँ।
हे परमपूज्य हे कर्मवीर!
हे अभिभावक हे कला प्रवीण!
शत-शत नमन आपको करता हूँ।
होली के वे सरस फाग भजन
अब फिर से कौन गाएगा
द्रुत गतिपूर्ण लय ताल बद्ध
ढोलक की थाप कौन सुनाएगा
त्रिवेणी संगम में रामायण धुन से
अब कौन हमें नहलायेगा।
परमपद मिले स्वर्ग में
प्रभु से विनती ऐसी करता हूँ।
हे परमपूज्य हे कर्मवीर!
हे अभिभावक हे कला प्रवीण!
शत-शत नमन आपको करता हूँ।
 

मानस चिंतक-कलाप्रवीण 



पोस्ट लेखक : पंकज कुमार (मुन्ना) - जिसे आपने पितृवत अपना अपार प्रेम और स्नेह प्रदान किया। 


Apr 26, 2020

Community Kitchen Dularpur Teghra Begusarai Bihar




सामुदायिक किचन दुलारपुर तेघरा बेगूसराय बिहार

भारत सरकार ने कोरोना की भयावहता को देखते हुए 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा की। भारत की जनता ने इसे हाथोंहाथ लिया और यह अभूतपूर्व रूप से सफल रहा। उसके बाद 25 मार्च से देशव्यापी लॉक डाउन की घोषणा 21 दिनों के लिए की गई। इसका दूसरा चरण 3 मई तक चलेगा। 


इस घोषणा के बाद आम जनजीवन बहुत प्रभावित हुआ और गरीब मजदूरों और किसानों के सामने सचमुच एक बहुत बड़ी समस्या आन पड़ी।  इसी को देखते हुए बिहार के बेगूसराय जिले के दुलारपुर गाँव के कुछ युवाओं ने जरूरतमंद और गरीब गुरबों की मदद करने का बीड़ा उठाया।  

कहते हैं न कि जहाँ चाह है वहां राह है।  इसके लिए कुछ युवाओं ने श्री राम जानकी मंदिर दुलारपुर ठाकुरबाड़ी में एक बैठक की और आगे की रणनीति बनाई।  मार्च महीने में ही उन लोगों ने सामुदायिक किचन दुलारपुर के नाम से एक व्हाट्सअप्प ग्रूप बनाया और उसमें ग्रामीण लोगों के साथ ही साथ प्रवासी ग्रामीणों को भी जोड़ा। इस ग्रूप के युवाओं ने आज की तकनीक का भरपूर उपयोग किया।  जब मीटिंग करनी होती तो ग्रूप पर सन्देश भेज ठाकुरबाड़ी में आकर विचार विमर्श कर आगे की योजना बनाते।  

प्रथम चरण में इन युवकों ने अपने दम पर आटा, चावल, दाल, सब्जी, सरसों तेल, नमक, साबुन, मास्क, सेनीटाईजर आदि आर्थिक रूप से जरुरतमंदों को बांटकर उनकी भरपूर मदद की।  इनके इन प्रयासों को देखते हुए देश के भिन्न- भिन्न शहरों में रह रहे ग्रामीणों ने भी इनको सहयोग देना शुरू किया।  इसी बीच गाँव के दो घर आग लगने से जल गए।  सामुदायिक किचन दुलारपुर के युवाओं ने अपने घरों से बच्चों के कपड़े, साड़ियां और राशन की व्यवस्था की।  







दूसरे और तीसरे चरण में भी सभी युवाओं ने बिना किसी भेदभाव के आर्थिक रूप से जरूरतमंद लोगों की मदद जारी रखी।   बीच में कुछ दिक्कतें भी आईं, लेकिन ये लोग अपने काम में लगातार लगे रहे।  

इन लोगों ने पूरे गाँव को सेनीटाईज करने का कठिन कार्य भी लगभग दो दिनों में पूरा कर दिया।  सामुदायिक किचन दुलारपुर के युवाओं  ने टीम वर्क करते हुए कई दल बनाकर अलग- अलग टोलों में सेनीटाईजेशन का काम शुरू किया। मुख्य सड़कों, घर के बाहरी भागों, सार्वजनिक स्थानों को सेनीटाईज  करने का काम बहुत ही जिम्मेदारी से किया गया।  लोगों की सहमति मिली तो घर के अन्दर भी छिड़काव किया।  


इस संस्था के कार्यों को एक आलेख में समेटना मुश्किल काम है। पूरे जिले में इनके कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है। इनके इन कार्यों की सराहना पूरे  मीडिया जगत द्वारा किया गया।   सामुदायिक किचन दुलारपुर के युवाओं को हार्दिक शुभकामनाएं देना चाहता हूँ कि आपके सद्प्रयासों को बहुत लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।  यह समस्त ग्रामीणों के सहयोग से किया गया एक ऐसा कार्य है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय, कम होगी।  उम्मीद है कि  सामुदायिक किचन दुलारपुर के युवा आगे भी अपनी इस एकता और जोश को कायम रखते हुए समाज सेवा का कार्य करते रहेंगे।  

पोस्ट लेखक: पंकज कुमार 


Apr 14, 2020

Bihar Kesari Dr Krishna Singh Freedom Fighter Chief Minister of Bihar

बिहार केसरी डॉक्टर कृष्ण सिंह, स्वंतत्रता सेनानी एवं बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री 


बिहार केसरी डा० श्रीकृष्ण सिंह

लाल भभुका चेहरा, विशाल वक्षस्थल, उन्नत ललाट पर रोली, माथे पर गाँधी टोपी, मस्त कुंजर की चाल, हिमालय की बुलन्दी, सागर की गहराई, कुछ में -कर गुजरने की तमन्ना लिए एक दैवी शक्ति के संस्कार से संपृक्त, एक हाथ -दर्शन का महान ग्रन्थ गीता और दूसरे हाथ में कृपाण । भगवान परशुराम की वंश-परम्परा, मुँह में चारो वेद, पीठ पर तीर भरे तरकस के सिद्धांत से आंकल लिप्त नवजवान मुंगेर के कष्टहरिनी घाट पर अंग्रेजों को भगाने और भारत को स्वतन्त्र कराने का संकल्प लेनेवाला यह कौन है ? भीड़ में कौतुहल है । उसके · साथ कुछ वकील हैं, किसी ने परिचय देते हुए कहा कि माऊर, बरबीघा. मुंगेर निवासी बाबू हरिहर प्र० सिंह के लड़के श्रीकृष्ण सिंह वकील हैं । किसे पता था कि आगे चलकर वही नोवजवान बिहार का निर्माता, राज्य का भाग्य विधाता और चलीस वर्षों तक बिहार की नस-नाड़ियों का संचालक, कर्ता-धर्ता विहार केसरी डा० श्रीकृष्ण सिंह बनेगा ।

डा० श्रीकृष्ण सिंह का जन्म २९ अक्टबर १८८५ को कार्तिक शुक्ल पक्ष "पंचमी के दिन हुआ था। बे पढ़ने में बड़े प्रतिभाशाली थे । एम०ए०, बी०एल० "करने के बाद उन्होंने १ अप्रील १९१५ को मुंगेर वकालत खाने में नये वकील के रूप में पदार्पण किये । वकालत के अतिरिक्त वे अपना पूरा समय किसान -आन्दोलन में लगाने लगे । खुदीराम बोस की सहादत, भगवान तिलक का "स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है" का नारा उन्हें अनुप्रेरित कर रहा था । न्न दिन में खाने की चिंता न रात में सोने का गम । देश कैसे आजाद हो, गरीबी कैसे मिटे, किसान कैसे खुशहाल हों, इसी ताने-वाने में लगा श्रीकृष्ण, भारत प्रोपदी का चीरहरण दुष्ट दुयोंधन अंग्रेज शासक न करने पावे, इसके लिए सतत् जागृत, सदैव सतर्क, सर्वस्व न्योछावर की भावना से तत्पर ।

लोकमान्य तिलक ने होम रूल आन्दोलन प्रारम्भ किया। बिहार में २९ अगस्त १९२१ से वे गाँव- गाव श्री कृष्ण सिंह पूरा बही कार्यकर्त्ता वन गये । घूमकर असहयोग आन्दोलन के लिए अलख जगाने लगे । वे उतने ओजस्वी वक्ता थे कि उनके भाषण के बाद मूर्दों में भी जान आ जाती थी । जहाँ कहीं भी इनके 'भाषण का कार्यक्रम रहता, रामलीला, रासलीला की तरह आसपास के गाँवों से जनसमुद्र उमड़ पड़ता था। उनके भाषण के बाद इलाके का तेवर ही बदल जाता था। सरकारी स्कूल, कॉलेज, कार्यालय वीरान पड़ने लगे। की वंशी पर व्रज के वासी सुध-बुध खोकर नाचने लगे खड़गपुर में किसान उसमें इनका सिंह गर्जन सुनकर उसी सभा में इन्हें बिहार केसरी की पदवी मिली जबतक इतका भाषण चला श्रोता किसानों की दुर्दशा का वर्णन सुनकर रोते रहे। जब इन्होंने जन चेतना का

शंखनाद फूका सारा बाता- वरण इनक्लाव के गगनभेदी नारे से गर्म हो उठा। अब बिहार केसरी अंग्रेज
की नजर में बिहार के सबसे खतरनाक व्यक्ति हो गये। मुहम्मद जुफेर और अन्यों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। प्रथम बार श्रीबाबू को एक वर्ष का सश्रम कारावास मिला। वे १९२३ में रिहा किये गये ।


१९२७ में श्रीबाबू बिहार विधान परिषद् के लिए निर्वाचित बे उसी वर्ष सर्वसम्मत विपक्ष के नेता चुने गये। विपक्ष के नेता के रूप में सदन में अपने भाषणों और बाहर में अपने कृत्यों से उन्होंने इतनी ख्याति अर्जित कर ली कि वे देश के गिने-चुने नेताओं में पाक्तय हो गये ।
कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय के अनुसार डा० श्रीकृष्ण सिंह ने १९२९ में बिहार विधान परिषद् की सदस्यता तथा नेता विपक्ष के पद से त्यागपत्र दे दिया।
बापू के आन्दोलन का दूसरा दौर चला। राष्ट्र पिता की मान्यता थी कि नमक देश के जन-जन को अमीर-गरीब सबको जोड़ने वाला रामरस है इस पर कर नहीं लगना चाहिए। विरोध में उन्होंने नमक बनाने का आदेश दे दिया जो देश में नमक सत्याग्रह के नाम से चला मुंगेर जिले (अब बेगुसराय) के गढ़पुरा गाँव में नमक सत्याग्रह के डिक्टेटर श्रीबाबू थे वे नमक बना रहे थे। पानी वाप्य तेजी से निकल रहे थे, कड़ाही लाल थी, उसकी में पुलिस ने सत्याग्रह स्थल
खल दल खोल रहा था,
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बंडी एकदम गर्म इतने को घेर लिया। डंडे बरसने लगे। पुलिस ने कड़ाही उलटने का प्रयास किया। श्रीबाबू ने दोनों हाथ से कड़ाही पकड़कर उसे छाती से सटा लिया। हाय छाती आग से जल रहे थे और सिर पर पैर पर देह पर तड़ातड़ पुलिस की लाठियां पढ़ रही थी। उनका सर फट गया। कपड़े रक्त से लाल हो गये, मगर कड़ाही की दोनों मुट्ठी हाथ में शरीर कड़ाह पर उन्हें पकड़कर पुलिस गाड़ी पर लाद दिया गया। भीड़ हटने का नाम नहीं, श्रीबाबू के अपील पर भीड़ हटी मुकदमा चला। श्रीबाबू को तुरत सजा दे दी गई। पहले भागलपुर, फिर हजारीबाग जेल में बन्द रहे छः महीने बाद उन्हें अक्टूबर को रिहा किया क्या ११ नवम्बर १९३० को



Mar 28, 2020

स्वतंत्रता सेनानी तारणी प्रसाद सिंह, बजलपुरा, तेघड़ा, बेगुसराय, बिहार

प्रस्तुत पोस्ट में हम बेगुसराय बिहार के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तारणी बाबू के बारे में चर्चा करेंगे. उम्मीद है कि यह जानकारी आपको अच्छी लगेगी. 





स्वतंत्रता सेनानी श्री तारिणी प्रसाद सिंह (बजलपुरा, तेघड़ा) से संबंधित एक और आलेख मिला है जिसे  मैं यहाँ शेयर कर रही हूँ .





स्रोत : बिहार के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रह्मर्षि समाज का योगदान (पुस्तक), लेखक : श्री राम बालक सिंह बालक, बैकुंठपुर, पटना, बिहार 

Jul 28, 2019

Father Was Everything for Me

2 July 2019

आज लगभग साढ़े दस बजे मेरे पिताजी प्रोफेसर चंद्रमौलि चौधरी को सीने में तेज दर्द हुआ. उन्होंने अपने हर्रख स्थित मकान में रह रहे शिक्षक राम उदय जी को इसके बारे में  बताया।

राम उदय जी ने स्थानीय डॉक्टर मुन्नाजी से संपर्क किया और उनके पास लेकर गए. रक्त चाप बहुत ज्यादा था. डॉक्टर ने उनको बेगूसराय के एक हॉस्पिटल ग्लोकल हॉस्पिटल में भरती करा दिया। ऑक्सीजन लगया गया और रक्त चाप को नियंत्रण में लाने का प्रयास चलता रहा. रात के दो बजे तक मेरा भाई सत्य प्रकाश भी पूर्णिया से बेगूसराय अपने वाहन से आ गया. 

बेगूसराय स्थित आवास 


3 July 2019 

ग्लोकल हॉस्पिटल में कोई सुधार न देखते हुए वहां से पटना रेफर कर दिया गया. पटना में मेडिका हार्ट इंस्टिट्यूट रोड नंबर १ राजेंद्र नगर में पिताजी को एम्बुलेंस द्वारा लाया गया. बेगूसराय से पटना आते वक़्त मकान में काम कर रहे सारे मिस्त्री, मजदूर और पेंटर भी उनसे मिलने आये और पिताजी ने सबको हाथ हिलाकर काम करते रहने का संकेत दिया। मेडिका हार्ट इंस्टिट्यूट को बिहार का सबसे अच्छा हार्ट का हॉस्पिटल माना जाता है. वहां डॉक्टर प्रभात कुमार सबसे बड़े डॉक्टर हैं. मेडिका में पिताजी की तबीयत उस दिन तक ठीक थी.

4 July 2019 
तीन तारीख को हम लोगों ने भी दिल्ली से पटना जाने का प्लान बनाया। 4 की सुबह को हमने दिल्ली से पटना की फ्लाइट ली और साढ़े ग्यारह बजे तक हॉस्पिटल आ गए. उस समय तक पिताजी ठीक थे. सबसे बात की. हमें आशिर्बाद दिया। दो बजे डॉक्टर ने बताया कि उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है. हम लोग भी उम्मीद लगाए थे कि भगवान् अच्छी खबर सुनाएंगे। इस प्रकार 4 तारीख भी निकल गया.

5  July 2019 

आज सुबह से ही मन में बैचैनी थी. आज पिताजी कुछ सुस्त नजर आ रहे थे. सुबह में कोई दस बजे कुछ खाया। दोपहर को उनको सेंट्रल लाइन वाला पाइप लगाया गया और चार बजे उनका सीपीआर( Cardio-Pulmonary Resuscitation) हो गया.  मेरे पति ने ICU में डॉक्टर को पिताजी का सीपीआर करते देखा। उस समय एक डॉक्टर ने उनसे कहा कि अब चांस काम है. उसके बाद उनको वेंटीलेटर का सपोर्ट दिया गया. उनकी हालत बिगड़ने लगी थी.

6  July 2019 
यह दिन हम सबके जीवन का सबसे दुखद दिन साबित हुआ. सुबह से ही बार बार पिताजी को ICU के विंडो से देखने जाती रही. यह सोचकर कि शायद पिताजी हमारी राह देख रहे हों. लेकिन वह तो हम सबसे पल पल दूर होते जा रहे थे. आज दिल्ली से मेरे बच्चे वृद्धि और आशु भी अपने मौसा जी के साथ फ्लाइट से पटना पहुंचे। सब इस उम्मीद में थे कि नानाजी ठीक होकर हमारे साथ चलेंगे। लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था. आज के दिन शाम को 5 बजकर 37 मिनट पर मेरे पिताजी हम सबको रोते बिलखते छोड़ सदा सदा के लिए चले गए.
देर रात तक उनका पार्थिव शरीर बेगूसराय स्थित उनके आवास सी एम् हाउस हर्रख पर लाया गया.


7   July 2019 

आज पिताजी को अंतिम विदाई देने का दिन था. मेरे गांव मकसपुर से कुछ लोग आये. बेगूसराय के स्थानीय लोग भी आये. पिताजी को सिमरिया लाया गया. रास्ते में घनघोर बारिश होने लगी. सब लोग परेशान थे कि अंतिम संस्कार कैसे होगा। लेकिन जैसे ही हमलोग सिमरिया पहुंचे मानो प्रकृति ने भी हमारा साथ देते हुए बादलों को कहीं और भेज दिया। मेरे भाई सत्य प्रकाश ने पिताजी को मुखाग्नि दी. इस प्रकार वे पंच तत्व में विलीन हो गए. 
प्रोफेसर चंद्रमौलि चौधरी विभागाध्यक्ष, रसायन विभाग, के एस एस कॉलेज, लखीसराय,
भागलपुर विश्वविद्यालय 


कर्मकांड के मुताबिक पिताजी का श्राद्ध किया गया. हमारे पिताजी आज जहाँ कहीं  भी होंगे हम सबको देख रहे होंगे और हम सबको आशर्वाद दे रहे होंगे। 
श्राद्ध कार्यक्रम 

पिताजी ! आप हम सबको बहुत याद आते हैं.... 



Nov 13, 2018

Lok Aastha Ka Mahaparv Chhath Pooja लोक आस्था का महापर्व छठ


छठ पूजा 2018

छठ को लोक आस्था का महा पर्व कहा जाता है. मूल रूप से बिहार का यह पर्व अपना विस्तृत आकार ले चुका है, आज यह पर्व न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट, दिल्ली आदि अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है. विदेश में रह रहे भारतीय लोग इसे बड़े ही उत्साह से मनाते हैं. इस पर्व में अस्ताचल गामी सूर्य को पहले अर्ध्य दिया जाता है और पुनः उदयाचल गामी सूर्य को अर्ध्य देकर इस पर्व की पूर्णाहुति होती है. प्रस्तुत है छठ से संबंधित कुछ फोटो.

अस्ताचल गामी सूर्य की आराधना करते छठ व्रती (आई टी ओ , दिल्ली घाट)

छठ पूजा समिति  और दिल्ली सरकार द्वारा बहुत ही उत्तम व्यवस्था 

यह जानकारी भी उपयोगी है 

पंडाल के अन्दर छठ का डाला और प्रज्वलित दीप 

छठ का डाला और मोबाइल पर बात -  दोनों साथ साथ 

छठी माता की आराधना 

सुरक्षा में तैनात जवान 

नदी के ठीक उपरी भाग में बना छठ तालाब. यहाँ का पानी यमुना नदी के पानी से ज्यादा साफ़ लगा 

पूजा की तैयारी 

सांस्कृतिक कार्यक्रम 

छठ पूजा एक विहंगम दृश्य 

दो लेयर में पूजा एक तालाब तो दूसरा यमुना नदी 

दंड देते एक व्रती
छठ के अवसर पर एक यह - ऑफर  भी
आप सभी को छठ महापर्व की हार्दिक बधाई. छठी मैया सबका कल्याण करें और विश्व में शांति और सौहार्द कायम हो. सबका मंगल हो. 

Jul 24, 2018

Radha Prasad Singh Freedom Fighter, Meghoul,Begusarai, Bihar

बेगुसराय जिला बिहार का एक महत्वपूर्ण जिला है. इस जिले में एक से बढ़कर लोग हुए. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, डॉ राम शरण शर्मा जैसे प्रसिद्द लोगों की यह धरती अपने में एक से बढ़कर एक इतिहास समेटे हुए है. प्रस्तुत पोस्ट में हम ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी का उल्लेख करेंगे.

राधा प्रसाद सिंह सुपुत्र द्वारिका प्रसाद सिंह, ग्राम मेघौल, जिला बेगुसराय, बिहार 


मेघौल निवासी राधा प्रसाद सिंह बाबू द्वारिका प्रसाद सिंह के सुपुत्र थे. देश के स्वाधीनता संग्राम में २४ अगस्त १९४२ को उन्होंने अपना आत्म बलिदान दिया.  घटना स्थल प्रखंड विकास खोदाबन्दपुर चौराही था. बेगुसराय जिला पहले मुंगेर जिला का अन्दर ही आता था.

अगस्त आन्दोलन का दमन करने के दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने जिस क्रूरता, रक्तपात और हिंसा की नीति का सहारा लिया, उसको शब्दों में बयान करना बहुत कठिन है. उन दरिंदों ने आजादी के सिपाहियों के साथ ही साथ निरीह ग्रामीणों के ऊपर जिस तरह का पाशविक अत्याचार किया, उसे सुनकर किसी भी सामान्य जन का रोम रोम काँप उठता है और उन ब्रिटिश गोरे लोगों के प्रति ह्रदय में नफरत और घृणा के भाव आ जाते हैं. 
२४ अगस्त के दिन अंग्रेज सैन्य अधिकारी एटकिन्स के नेतृत्व में सैनिकों की एक हथियारबंद टुकड़ी समस्तीपुर के क्षेत्रों में आतंक और कोहराम मचाने के बाद मेघौल नामक गाँव में पहुँची. यह गाँव वर्तमान में जिला मुख्यालय बेगुसराय से उत्तर दिशा में स्थित है.

उन दानवों की टोली के गाँव में प्रवेश करते ही ग्रामीणों के बीच अफरा तफरी मचना शुरू हो गया. जिनको जिधर का रास्ता दिखा, वे उधर ही गाँव के चारों तरफ गाँव छोड़कर  भागने लगे.  अंग्रेज सैनिकों ने लोगों के घरों पर पेट्रोल छिटकर आग लगाना शुरू कर दिया. राधा प्रसाद सिंह का भी घर जलाने को वे लोग आगे बढे. संयोगवश राधा प्रसाद सिंह उस समय अपने घर में ही मौजूद थे. उनके बहुत प्रतिकार करने के बाबजूद भी उन अत्याचारियों ने उनके घर में आग लगाकर उनके घर को जला डाला.

कुल इक्कीस लोगों के घर जलाये गए. अंग्रेजों का विरोध करने पर उन्होंने राधा प्रसाद सिंह को पहले तो बन्दुक के कुंदे से बहुत पीटा और अंग भंग कर दिया. गाँव से बाहर जाते समय उन नर पिशाचों ने उनको गोली मारकर बुरी तरह से घायल कर दिया. 

उनके कुछ शुभचिंतक उपचार हेतु उनको बेगुसराय अस्पताल ले जा रहे थे. बीच मार्ग में ही उनके प्राण पखेरू उड़  गए. इस प्रकार मेघौल गाँव का यह सीधा साधा मानव अंग्रेजों के दमन से अपने गाँव को बचाने के क्रम में वीरगति को प्राप्त हो गए.


Source: शहीदों की स्मृति लेखक: डॉ. नागेन्द्र सिन्हा, सूर्य भारती प्रकाशन, दिल्ली 

Jul 15, 2018

Yogendra Shukla Freedom Fighter of Bihar


अमर सेनानी श्री योगेन्द्र शुक्ल

Yogendra Shukla Freedom Fighter of Bihar अमर सेनानी श्री योगेन्द्र शुक्ल 


आज हम इस आलेख में बिहार के महान स्वतंत्रता सेनानी श्री योगेन्द्र शुक्ल के विषय में बातचीत करेंगे. उनका जन्म सन १८९६ में विजयादशमी के दिन मुज्ज़फरपुर (अब वैशाली) जिले में गंडक नदी के किनारे बसे गाँव जलालपुर के एक साधारण किसान के घर में हुआ था. उनके पिता श्री गन्नू शुक्ल एक सीधे-साधे किसान थे. वे दिन रात खेत में श्रम कर अपने परिवार का गुजारा करते थे. श्री योगेन्द्र शुक्ल अपने माता पिता की एकलौती संतान थे. इनके जन्म के कुछ समय पश्चात् ही इनकी माता हैजे के चपेट में आकर स्वर्ग सिधार गयीं. वे बहुत दिनों तक इस दुःख से दुखी रहे और सोते सोते अचानक मां मां पुकार कर रोने लगते थे. लोअर की पढाई उन्होंने अपने गाँव की पाठशाला में की. बाद में वे लालगंज स्कूल में पढने चले गए. वे अपनी कक्षा के सबसे तेज परन्तु नटखट छात्र थे. उनके चाचा भभीख नारायण शुक्ल मुज्ज़फरपुर में काम करते थे. उनके चाचा योगेन्द्र को १९१३ में मुज्ज़फरपुर ले गए और वहीँ पर उनका नामांकन भूमिहार ब्राहमण कॉलेजिएट स्कूल में करा दिया. उसी समय खुदीराम बोसे द्वारा मुज्ज़फरपुर में ही अंग्रेजों पर बम फेंकने और उनकी शहादत की घटना से वहां के युवाओं में उमंग की लहर थी. उन्ही दिनों आर्य समाजी साधू स्वामी सत्यदेव अमेरिका से लौटकर मुज्जफरपुर आये थे. वे छात्रों के साथ अमरीकी स्वतंत्रता की चर्चा किया करते थे. उनकी बातों से प्रेरित होकर शुक्ल जी ने पढाई छोड़कर अमेरिका जाने का निर्णय ले लिया. पटना के सेवा सदन के साथियों के संपर्क से उन्होंने अमरीका जाने का विचार त्याग दिया और देश में ही रहकर क्रांति की तैयारी करने लगे. इसी क्रम में वे दादा कृपलानी के सानिध्य में आये जो उन दिनों भूमिहार ब्राहमण कॉलेज में प्राध्यापक थे. दादा ने उन्हें फिर से पढने की सलाह दी लेकिन शुक्ल जी राजी नहीं हुए. उस समय कृपलानी जी महीनो से बीमार चल रहे थे. शुक्ल जी ने जी जान से उनकी सेवा की. फिर कृपलानी जी के पिताजी बीमार पड़े. शुक्ल जी करांची जाकर लगातार छः महीनो तक उनकी सेवा की और उनकी जान बचाई. बदले में खुद पियरी रोग के शिकार हो गए और महीनों तक बीमार रहे.

शुक्ल जी की इस सेवा भाव के बारे में महात्मा गांधी और सरदार पटेल तक को पता था.  वे उनको उस समय बिहार के एक अनमोल रत्न के रूप में जानते थे.

असहयोग आन्दोलन और शुक्ल जी 


यह बात सन १९१९ -२० की है. गांधीजी अपने असहयोग आन्दोलन की तैयारी में लगे हुए थे. सारे देश में एक उत्साह और उमंग की लहर सी थी. असहयोग आन्दोलन प्रारंभ होते ही कृपलानी जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की प्राध्यापकी छोड़ दी और २५० लड़कों को लेकर बनारस में एक आश्रम स्थापित कर दिया. श्री योगेन्द्र शुक्ल भी उस आन्दोलन में जोर शोर से जुट गए. बनारस में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के आगमन के अवसर पर उनके स्वागत के बहिष्कार के कारण कृपलानी जी अपने १२ साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए.
दूसरे दिन सुबह शुक्ल जी एक और आश्रम वासी के साथ थाने के बरामदे पर चढ़कर जोर जोर से कहने लगे – प्रिंस का बायकाट करो ... प्रिंस ऑफ़ वेल्स का बायकाट करो. अब उनको भी गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया.


जेल की दिलचस्प घटना 


इन्हीं दिनों जेल में एक बहुत ही दिलचस्प घटना घटी.  इससे शुक्ल जी के अदम्य साहस का भान होता है. शाम को जन सारे कैदियों को बंद किया जाने लगा तो शुक्ल जी सबकी आँख बचाकर उस कड़ाके की सर्दी में पानी से भरे एक टब में बैठ गए. गिनती के समय जब एक कैदी कम पाया गया तो खोज शुरू हो गयी. उन दिनों ब्रिटिश सरकार में एक कैदी का भाग जाना बहुत ही असाधारण घटना थी. इससे जेल के अधिकारी को भी सजा दी जा सकती थी. बहुत दौड़ धूप और खोज बीन शुरू हो गयी. जेल का कोना कोना छान लिया गया. शुक्ल जी का कहीं पता नहीं चल सका. बहुत रात बीतने पर जब शुक्ल जी टब से बाहर निकले तो उनके इस दुस्साहस को देख सभी लोग दंग रह गए.

जेल से छूटने के पश्चात पुनः शुक्ल जी कृपलानी जी के आश्रम में आ गए. जब कृपलानी जी साबरमती आश्रम, गुजरात गए तो वे भी उन्हीं के साथ साबरमती चले गए. साबरमती आश्रम में शुक्ल जी हर तरह का काम करते थे. जैसे बापू की तेल मालिश, कमरों की सफाई और ऐसे सभी छोटे छोटे काम जो उन दिनों के सफेदपोश तैयार न थे और शायद आज भी वैसे लोग तैयार न हों. वे उसमे अपना अपमान समझते थे. लेकिन शुक्ल जी एक काम नहीं करते थे और अन्य सभी लोग उस काम में जरुर शामिल होते थे – वह था बापू की प्राथना सभा में शामिल होना. आश्रम के नियम के अनुसार हर आश्रम वासियों को प्रार्थना में शामिल होना अनिवार्य था. लेकिन शुक्ल जी का कहना था कि उनको ईश्वर और प्रार्थना में विश्वास नहीं. वे कर्म को ही ईश्वर मानते थे. आश्रम के कुछ लोगों ने इसकी शिकायत गांधी जी से कर दी. गांधी जी बोले – “प्रार्थना से जो चीज मनुष्य को प्राप्त होती है वह योगेन्द्र को यों ही प्राप्त है.” 

शुक्ल जी साबरमती आश्रम में कुछ दिनों तक रहे लेकिन आन्दोलन के अहिंसात्मक तरीके पर विश्वास न जैम पाने के कारण वहां से चले गए. गांधी जी शुक्ल जी के जाने पर दुखी हुए, मगर स्नेह भाव बराबर बनाये रखा. इससे पूर्व शुक्ल जी बनारस, हमीरपुर, सुल्तानपुर, मेरठ आदि खादी आश्रमों में भी तीन चार साल रहे. १९२५ में वे फिर हाजीपुर लौट आये और ब्रिटिश सरकार के शब्दों में कहा जाय तो उस इलाके को अराजकता वादियों का भयंकर केंद्र बनाया और अपना नाम लाल क्रांतिकारियों के लिस्ट में दर्ज करा दिया.

क्रांति दल में शामिल 


क्रांति दल में शामिल होने के बाद शुक्ल जी पंजाब चले गए. अपने निर्भीक स्वाभाव, दृढ विचार और अजेय साहस के कारण उन्होंने क्रांतिकारी दल में शीघ्र ही विश्वास और योग्य स्थान प्राप्त कर लिया. सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजेंद्र लाहिरी, शचीन्द्र बक्शी आदि क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने दल को देशव्यापी संगठन का रूप दिया. ब्रिटिश हुकूमत को सशस्त्र क्रांति के द्वारा उखाड़ फेंकने के लिए भोपाल में एक स्थान तय किया गया और शुक्ल जी को उसका प्रबंधक बनाया गया. १९२८ में चंपारण के जंगल में लाकर भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद को निशानेबाजी का प्रशिक्षण दिया. सशस्त्र क्रांति हेतु जमा किये गए अपने गुप्त शस्त्रागार दिखलाया, जिसे देखकर भगत सिंह भी स्तब्ध रह गए.  वे बम्बई, कलकत्ता, करांची इत्यादि जगहों पर भी क्रांतिकारी संगठन के काम से गए और सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में कूद पड़े. कुछ ही दिनों में उन्होंने हाजीपुर से बहुत से युवकों को दल में शामिल कर प्रशिक्षित कर दिया. सरदार भगत सिंह और अन्य बड़े क्रांतिकारी यहाँ बराबर आते रहते थे. जब भगत सिंह आते थे तो वे उनको आम के बगीचे में ठहराते और उनका परिचय एक आम के व्यापारी के रूप में देते थे. उन दिनों क्रांतिकारियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बनाई. चंद्रशेखर आज़ाद इस संस्था के हेड थे.  शुक्ल जी इस आर्मी के प्रमुख नायक थे. ३ जुलाई १९२९ को मौलनिया डकैती केस के सिलसिले में शुक्ल जी के नाम का गिरफ्तारी वारंट निकला, वे १० जून १९३० तक फरार रहे. इन दिनों उनके द्वारा किये गए एक एक काम उनकी जिन्दादिली और दुर्दांत साहस का परिचायक है.

सरदार भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल जेल का फाटक तोड़कर छुड़ा लेने की योजना बनाई गयी. इसके लिए चंद्रशेखर आज़ाद ने शुक्ल जी को बिहार से बुलबाया. पर उसी समय भेद खुल जाने के कारण इस योजना को स्थगित कर  दिया गया. शुक्ल जी दिल्ली से वापस लौटे. उनके पीछे दिल्ली से ही सी आई डी के लोग पीछे लग गए थे. आगरा कैंट स्टेशन पर शुक्ल जी को इसका आभास हुआ. मेल ट्रेन जब स्टेशन से खुली और पूरी रफ़्तार में आ गयी तो उस काली स्याह रात में शुक्ल जी ट्रेन से कूद पड़े. उनको काफी चोटे आयी. थोड़ी देर सुस्ताने के बाद वे फिर चल पड़े.


उसी समय एक अन्य घटना घटी जो इस प्रकार है:


हाजीपुर में उनको पता चला कि पुलिस उनको पकडने आ रही है. रास्ते में चल रहे एक यात्री को पिस्तौल दिखाकर उसकी साइकिल ले ली और चलते बने.  कुछ दूर जाने पर देखते हैं कि हाजीपुर गंडक पुल को दोनों ओर से सशस्त्र पुलिस ने घेर रखा है और उनको जिन्दा या मुर्दा पकड़ने को तत्पर है. फिर क्या था अदम्य साहस का परिचय देते हुए वह वीर बांकुरा भादो मास की उमड़ती विकराल धार वाली गंडक नदी में कूद गए. अब पुलिस वाले पानी में तैर रहे शुक्ल जी की पगड़ी पर गोली बरसाने लगे. वे नदी में गोता लगाकर पुलिस की गोलियों को चकमा देते रहे और तेज गति से तैरते रहे. १४ मील तैरने के बाद गंगा की धार से निकल कर मारुफगंज पहुचकर पुरी रात गीले कपडे में बिताई. अहले सुबह मोकामा, सिमरिया, बेगुसराय होते हुए पुनः अपने इलाके में लौट आये.

बिहार में हुई राजनैतिक डकैतियों के बारे में अपने दिए गए फैसले में अंग्रेज जज ने शुक्ल जी के बारे में लिखा था – “वह इन कांडों के प्रमुख व्यक्ति हैं. वह एक सुपुष्ट और सुन्दर शरीर वाले आदमी हैं. इसमें संदेह नहीं कि अपने साथियों और सहयोगियों पर इनका बड़ा प्रभाव है. वे अंग्रेजों को मारने, ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे के लिए हथियार और पैसे एकत्रित करने के लिए वे डकैतियां करते- कराते रहते हैं.”

शुक्ल जी मलखाचक ने ठहरे हुए थे. एक गद्दार रामानंद सिंह ने उनको सोये हुए ही गिरफ्तार करवा दिया. उनकी गिरफ्तारी ११ जून १९३० को हुई. भेदिये से मिली सूचना पाकर छपरा से एक विशेष ट्रेन में मिलिट्री के साथ एक सार्जेंट आया. ट्रेन को मलखाचक के पास रोक दी गयी और गाँव को चारों ओर से घेर लिया गया. एक दर्जन बन्दुक धारी पुलिस उस स्थान पर पहुंचे जहाँ शुक्ल जी बेखबर सो रहे थे. सैनिक उनके हाथ, पैर को पकड़ लिया और छाती पर सवार हो गया. उनके हाथ पैर बाँध दिए गए और तलाशी ली गयी. उनके तकिये के नीचे से दो लोडेड रिवोल्वर मिले. उनको बेरहमी से पीटा गया और अधमरा कर दिया. गुदा मार्ग में मिर्च ठुसे गए और उनका बहुत भयानक तरीके से टार्चर किया गया कि वे अपने अन्य फरार क्रांतिकारियों का पता बता दें. शुक्ल जी ने उनको जवाब दिया – “ मुझे जानकारी तो सबके बारे में और सब कुछ है पर मैं एक भी शब्द बतलाऊंगा नहीं.” तब उन्हें आधी बेहोशी की हालत में बांस में बांधकर और १२ सैनिक लारी तक ले गए. वहां ले जाकर इस सपूत वीर को एक बोरे की तरह लारी में पटक दिया. उनको अनेक मुकदमों में कुल मिलाकर २२ वर्षों का सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी. भागलपुर, हजारीबाग और कलकत्ता के जेल में रखते हुए उन्हें दिसम्बर १९३२ में कालेपानी की सजा सुनाई गयी और उनको अंडमान के जेल में भेज दिया गया. वहां भी उनको लगातार संघर्ष करना पड़ा. अनशन पर विश्वास नहीं रखनेवाले इंसान को अपने साथियों के साथ कितनी बार अनशन करना पड़ा. जब भागलपुर जेल में उनको बेड़ियाँ डाली गयी तब १८ दिनों तक अनशन करके उन्होंने उस ज़माने के जेल अधिकारियों को भी झुका दिया और बेड़ियाँ हटाने को मजबूर कर दिया. १९३३ में अंडमान में अन्य ७५ कैदियों के साथ भूख हड़ताल के दौरान उनकी एक आँख पूरी तरह से ख़राब हो गयी थी और दूसरी की ज्योति क्षीण. अपने जेल जीवन में अनेक बीमारियाँ उनकी जीवन संगिनी हो गयी और मौत तक उनके साथ बनी रही. १९३७ में बिहार में एवं अन्य कुछ राज्यों में १९३५ इंडिया एक्ट के अनुसार निर्वाचन हुए और कांग्रेस की सरकार बनी. डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह बिहार के प्रधानमंत्री बने. स्वतंत्रता सेनानी जो जेलों में बंद थे, कुछ रिहा कर दिए गए परन्तु योगेन्द्र शुक्ल की रिहाई के सवाल पर राज्यपाल सहमत नहीं हो रहे थे. डॉ. श्री कृष्ण सिंह ने इस सवाल पर अपनी सरकार का त्यागपत्र पेश कर दिया कि यदि एक भी स्वतंत्रता सेनानी जेल में रहा तो मैं राज्य नहीं चलाऊंगा. अंत में वायसराय के हस्तक्षेप पर राज्यपाल को झुकना पड़ा और शुक्ल जी १९३९ में जेल से रोगी की हालत में बाहर आये.

मगर शुक्ल जी की तो अलग ही मस्ती थी. बाहर आते ही पुनः उसी मार्ग पर आ गए, जहाँ से जेल, सेल, लाठी, गोली के सिवा कुछ नहीं मिलता है. १९४२ की क्रांति में हाजीपुर धू –धू कर जलने लगा. शुक्ल जी पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और केंद्रीय कारा हजारीबाग में बंद कर दिया गया. वहां उनके साथ कई अन्य लोग भी थे जिनमे प्रमुख बसाबन सिंह, श्याम नंदन वर्मा, राम नंदन मिश्र, सूरज नारायण सिंह, जय प्रकाश नारायण, गुलाली लोहार थे. शुक्ल जी ने अपने काँधे पर चढ़ाकर एक दो तीन आदमियों को जेल की चाहरदीवारी की उंचाई तक पहुंचा दिया और ऊँची दीवार को फांद, बीहड़ जंगल अंधेरी रात काँधे पर जे. पी., एक हाथ से राम नंदन मिश्र को थामे भाग निकले और एक बार फिर से क्रांतिकारी कार्य में लग गए. रास्ते में एक बाघ निकला तो सभी डर गए. मगर जब जंगल के शेर ने धरती के शेर को देखा तो रास्ता बदलकर चला गया.

क्रांतिवीर शुक्ल जी के वीरता की कहानियों का कोई अंत नहीं है. १९४९ में शुक्ल जी कुछ कांग्रेसी नेताओं के साथ एक बार नाव पर सवार होकर हाजीपुर से पटना आ रहे थे. बीच धार में मल्लाह ने कहा – ‘ भयानक आंधी आ रही है और लगता है कि अब हमलोग गंगा के बाहर नहीं निकल पायेंगे”. शुक्ल जी ने यह सुनते हुए जल्दी से पतवार थाम ली. सात मिनट में नौका को लाकर पटना के घाट पर लगा दिया. आधे घंटे की यात्रा सात मिनट में पूरी कर ली. घाट पर पहुँचने पर तेज आंधी आयी और घुप्प अँधेरा छा गया. शुक्ल जी के कारण ही मल्लाह सहित सभी सवार पटना पहुँच पाए वरना नदी में डूब गए होते. शुक्ल जी उस समय एम् एल सी थे.

विधान परिषद् के सदस्य 


१९४८ में शुक्ल जी प्रजा समाजवादी दल के उम्मीदवार के रूप में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए और १९५३ तक इस पद पर रहे. वे अपने वेतन का अधिकांश भाग दल के कामों के लिए दे दिया करते थे. उनके नाम से आवंटित क्वार्टर का भी उपयोग पार्टी कार्यालय के रूप में किया जाता था. उनकी कोई भी चीज यहाँ तक कि उनकी जिन्दगी भी उनके लिए नहीं थी, उनका रोम रोम देश को समर्पित था. लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में इस महान राष्ट्रभक्त की बहुत उपेक्षा हुई. अंतिम समय में ब्लाक का डॉक्टर भी उनका इलाज करने नहीं आता था. कोई नेता भी उनका कुशल क्षेम पूछने नहीं आता था. इस महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन १९ नवम्बर १९६६ को रात के दो बजे पटना मेडिकल हस्पताल के कॉलेज वार्ड में हो गया. उनके पुत्र का नाम वीरेंद्र शुक्ल है. शुक्ल जी का जन्म ब्रह्मर्षि कुल में हुआ था और आज आजादी के दीवाने के धरोहर को बचाने की जरुरत है. राष्ट्र के लिए अपने सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस महान सेनानी को इतनी उपेक्षा हुई है जिसका कोई वर्णन नहीं है. इनके गाँव जलालपुर को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने का प्रयास सरकारों को करनी चाहिए. शुक्ल जी का जीवन उन तमाम युवाओं और देश प्रेमियों के लिए आदर्श है जिनके आदर्श सरदार भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद रहे हैं.

Jun 6, 2018

Welcome Mobiistar to India


First of all, as an Indian I would like to welcome Mobiistar to India! I would like to Carl Ngo to India! Namste to all Vietnamese people!



Mobiistar Indiblogger Blogmeet in Delhi


23 May 2018 का दिन हमारे लिए बहुत ही अच्छा था. करीब एक साल बाद दिल्ली में blogmeet होने जा रहा था. मैं काफी उत्साहित थी कि काफी अरसे बाद अपने Blogger friends से मिल पाउंगी. यह शुभ घड़ी Mobiistar Smartphone के भारत में launch के कारण आयी. उसी दिन पूर्वाहन में मीडिया और smartphone प्रेमियों के समक्ष Mobiistar ने अपने smartphone के दो models का launch किया था और अपराहन में इस blogmeet का आयोजन किया गया था. इसका venue Hyatt होटल था.



Something about Mobiistar Smartphone Company


Mobiistar Smartphone Company वियतनाम की एक जानी मानी फ़ोन कंपनी है. Carl Ngo इसके CEO और Head हैं. यह कंपनी मात्र नौ वर्ष पुरानी है और इसकी गिनती वियतनाम के टॉप 5 smartphone कंपनी में की जाती है. Carl Ngo युवा, हंसमुख और काफी मिलनसार व्यक्तित्व के मालिक हैं.

Mobiistar XQ और CQ का Launch




जैसा कि पहले लिख चुकी हूँ कि Carl जो कि मोबीस्टार फ़ोन कंपनी के हेड हैं तो लाजिमी था कि कार्यक्रम में उनका बहुत ही महत्वपूर्ण रोल था. हालांकि इसकी शुरुआत नवोदित ब्लॉगर परिचय से हुआ. बाद में खुबसूरत एंकर ने मंच कार्ल के हवाले कर दिया.


Carl Ngo’s Presentation: Main Points


1. कार्ल के मुताबिक़ दोनों फ़ोन मॉडल्स की सबसे अच्छी विशेषता इसका सेल्फी फीचर है. इसलिए इसका हैश टैग भी #EnjoyMore रखा गया है.

2.  Mobiistar XQ Dual को selfie star भी कहा जा सकता है.  इसमें 13 MP और 8 MP का selfie camera लगा है. पीछे का कैमरा यानी Rear camera भी 13MP है.  इसमें Qualcom Snapdragon प्रोसेसर लगा है जो बहुत तेज काम करता है. इसमें 3GB RAM और 32GB ROM है. बात यहीं ख़तम नहीं होती! इसके सेल्फी का रेंज बहुत wide यानी 120 डिग्री का है. इसका स्क्रीन 5.0 HD इंच और 2.75D curve है जिसकी वजह से बेहतरीन सेल्फी ली जा सकती है.



3.  दूसरा फ़ोन Mobiistar CQ  है. इसका आगे का कैमरा 13 MP है. इसमें 2 GB RAM और 16 GB ROM है.

4. इसका बैटरी बैकअप भी बहुत अच्छा रखा गया है. इसमें लगभग 3000 mah का बैटरी लगाया गया है.

5.  इसका कैमरा बहुत अच्छा है और अन्य फ़ोन के मुकाबले सेल्फी क्वालिटी बहुत बढ़िया है.

6. सबसे बेहतरीन चीज जो मैंने अनुभव किया वह इसका प्राइसिंग है. Mobiistar XQ Dual फ़ोन INR 7999 में और Mobiistar CQ  फ़ोन 4999 रूपये के मूल्य में उपलब्ध है. इस तरह का फोन बाजार में कोई दूसरा नहीं है.

7.  मोबी स्टार ने पूरे देश में 1000 सर्विस सेंटर खोले हैं ताकि ग्राहकों को सर्विस में कोई परेशानी न हो.



8. आरम्भ में यह फ़ोन सिर्फ फ्लिपकार्ट पर ही उपलब्ध रहेगा जैसा कि कार्ल ने अपने सेशन के दौरान बताया. सबसे अच्छी बात यह थी कि किसी भी smartphone को exchange करने पर INR 1000 की विशेष छूट का लाभ भी ग्राहकों को मिलेगा.

Purchase Mobiistar Smartphone Here: Mobiistar XQ


यहाँ पर मैंने सिर्फ unique features लिखे हैं. इसके अलावा भी फ़ोन का लुक, टच, फील और सेल्फी के क्वालिटी को सिर्फ फ़ोन को यूज़ करने के बाद ही महसूस किया जा सकता है.


Blogmeet Activity

चूँकि यह एक फ़ोन के लांच से सम्बंधित event था इसलिए इसमें एक्टिविटी का थीम भी सेल्फी ही था. उपस्थित सभी ब्लॉगर को टीम में बाँट कर सबको MObiistar XQ Smartphone दिया गया. सभी टीम को किसी थीम या स्टोरी को ग्रुप सेल्फी के माध्यम से दिखाना था. सभी टीम ने बढ़-चढ़कर इस एक्टिविटी में भाग लिया.



इस ब्लोगमीट में हाई टी का भी बेहतरीन इंतजाम किया गया था. बीच में संगीत और मनोरंजंन का भी प्रबंध किया गया था. कुल मिलाकर यह एक बहुत ही शानदार blog meet था. Thank You Mobiistar!